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सीमा पर पहरा देने वाले जवान को घर की व्यवस्था से क्यों नहीं लड़ना चाहिए?

सीमा पर पहरा देने वाले जवान को घर की व्यवस्था से क्यों नहीं लड़ना चाहिए?

क्या आपने कभी सोचा है कि माइनस डिग्री तापमान में सियाचिन की बर्फीली चोटियों पर देश की रक्षा करने वाला जवान जब छुट्टी पर घर लौटता है, तो उसे किन मानसिक परेशानियों से गुजरना पड़ता है? देश की सीमाओं को सुरक्षित रखने वाले हमारे सैनिक अपनी जान की बाजी तो हंसते-हंसते लगा देते हैं, लेकिन जब बात उनके अपने अधिकारों, जमीन-जायदाद या पेंशन की आती है, तो वे अपनों के बीच ही एक अजीब सी जंग लड़ने को मजबूर हो जाते हैं। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि हमारे पूरे प्रशासनिक तंत्र के लिए एक बड़ा सवालिया निशान भी है।

जब अपनों के बीच ही शुरू हो जाती है एक अनकही जंग

गढ़वाल राइफल्स के पूर्व सैनिक और पूर्व सैनिक संघर्ष समिति, कोटद्वार के अध्यक्ष महेंद्र पाल सिंह रावत ने इस गंभीर मुद्दे पर खुलकर बात की है। उनका साफ कहना है कि किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा केवल हथियारों के दम पर नहीं होती, बल्कि उस व्यवस्था पर टिकी होती है जो सैनिकों के सम्मान और कल्याण की रक्षा करती है।

दुर्भाग्य से, हकीकत इससे काफी अलग है। जब एक सैनिक अपनी कठिन ड्यूटी से कुछ दिनों की छुट्टी लेकर घर पहुंचता है, तो उसे परिवार के साथ सुकून के पल बिताने का मौका मिलने के बजाय तहसील, कचहरी, रेवेन्यू डिपार्टमेंट और थानों के चक्कर काटने पड़ते हैं। ज़मीन के विवाद, पेंशन की फाइलें, और सरकारी दफ्तरों के अनगिनत चक्कर उसके उस बहुमूल्य समय को लील लेते हैं, जो उसे अपने बूढ़े माता-पिता, पत्नी और बच्चों के साथ बिताना चाहिए था।

मानसिक एकाग्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर

इसे केवल एक आम प्रशासनिक सुस्ती मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसका सीधा असर हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है:

  • मानसिक तनाव: जिस जवान का दिमाग सीमा पर पहरा देते वक्त भी घर के लंबित मामलों और मुकदमों में उलझा रहेगा, वह अपनी पूरी क्षमता से देश की सेवा कैसे कर पाएगा?
  • कमजोर मनोबल: सैनिक का हौसला केवल बंदूकों से नहीं, बल्कि इस अटूट विश्वास से बढ़ता है कि उसका देश और उसकी व्यवस्था उसके परिवार के साथ खड़ी है।
  • सेवानिवृत्ति के बाद का संघर्ष: वर्दी उतारने के बाद जिन वीर जवानों ने अपने जीवन के दो-तीन दशक देश को दिए, उन्हें अपने ही हक के लिए दर-दर भटकना पड़े तो यह हमारे संवेदनशील लोकतंत्र के लिए शर्म की बात है।

सिर्फ नारों और भाषणों तक सीमित न रहे सैनिकों का सम्मान

अक्सर देखा जाता है कि राष्ट्रीय पर्वों, स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं, वीरों को याद किया जाता है और श्रद्धांजलि दी जाती है। लेकिन क्या सैनिकों का सम्मान सिर्फ कुछ दिनों के भाषणों और रस्म अदायगी तक सीमित रहना चाहिए? असली सम्मान तब शुरू होता है जब उनकी समस्याओं का समाधान समयबद्ध (Time-bound), पारदर्शी और पूरी संवेदना के साथ हो।

क्या है इस समस्या का ठोस समाधान? राष्ट्रीय सैन्य आयोग की मांग

जिस तरह महिलाओं, बच्चों और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए देश में स्वतंत्र आयोग बने हैं, ठीक उसी तर्ज पर अब 'राष्ट्रीय सैन्य आयोग' (National Military Commission) के गठन की मांग जोर पकड़ रही है। यदि ऐसा कोई प्रभावी संस्थान बनता है, तो इसके क्या फायदे होंगे?

  • पेंशन से जुड़ी जटिल समस्याओं का तुरंत निस्तारण।
  • पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों के भूमि विवादों का त्वरित समाधान।
  • स्वास्थ्य, शिक्षा और पुनर्वास से जुड़ी प्रशासनिक शिकायतों पर सीधी नजर।
  • न्यायिक विलंब से सैनिकों के परिवारों को राहत।

यह किसी एक सरकार या दल का नहीं, पूरे राष्ट्र का दायित्व है

सैनिक किसी पार्टी, जाति या विचारधारा का नहीं होता, वह सिर्फ और सिर्फ भारत माता का होता है। इसलिए उसकी गरिमा और अधिकारों की रक्षा किसी राजनीतिक बहस का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक जिम्मेदारी है। आज जरूरत इस बात की है कि हम सैनिकों के शौर्य का गुणगान करने के साथ-साथ एक ऐसी फूल-प्रूफ व्यवस्था बनाएं जहां उन्हें अपने ही देश में न्याय के लिए दो-दो हाथ न करने पड़ें।

एक मजबूत और अजेय सेना का आधार केवल आधुनिक हथियार नहीं, बल्कि एक निश्चिंत सैनिक होता है। अगर हम चाहते हैं कि हमारे देश की सीमाएं अभेद्य रहें, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सीमा पर खड़ा हर जवान अपने घर-परिवार और कानूनी उलझनों की चिंता से पूरी तरह मुक्त हो।सैनिक को केवल एक ही लड़ाई लड़ने की छूट मिलनी चाहिए—और वह है 'राष्ट्र की रक्षा की लड़ाई'। उसे अपने ही देश की लचर व्यवस्था से दूसरी लड़ाई लड़ने के लिए विवश करना न तो न्यायसंगत है और न ही देशहित में।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: सैनिकों और पूर्व सैनिकों को मुख्य रूप से किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?

Ans: अधिकांश सैनिकों को छुट्टी के दौरान भूमि विवाद, पैतृक संपत्ति के मामले, पेंशन से जुड़ी अड़चनें और सरकारी दफ्तरों में लाल फीताशाही के कारण प्रशासनिक व न्यायिक विलंब का सामना करना पड़ता है।

Q2: राष्ट्रीय सैन्य आयोग (National Military Commission) के गठन से क्या लाभ होगा?

Ans: इस आयोग के बनने से सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों की शिकायतों, पेंशन मामलों और भूमि विवादों का त्वरित और पारदर्शी समाधान हो सकेगा, जिससे उन्हें अदालतों या दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

Q3: आम नागरिक या समाज सैनिकों के कल्याण में कैसे योगदान दे सकता है?

Ans: समाज और स्थानीय प्रशासन को यह समझना होगा कि सैनिकों के मामले सर्वोच्च प्राथमिकता पर निबटाए जाएं, ताकि वे मानसिक रूप से तनावमुक्त होकर देश की सीमाओं की रक्षा कर सकें।

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रिपोर्टर: Kavya Tripathi

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