उत्तराखंड का कोटद्वार, जिसे देश और दुनिया में 'गढ़वाल का प्रवेश द्वार' और 'कण्व नगरी' के नाम से जाना जाता है, इन दिनों अपनी एक बदहाल पहचान को लेकर चर्चा में है। जिस जगह को आधुनिक सुविधाओं से लैस होना चाहिए था, वहां आज सिर्फ अधूरे पिलर, गहरे गड्ढे और ताले लगे हुए हैं। यह दर्द किसी आम नागरिक का नहीं, बल्कि खुद कोटद्वार के मोटर नगर बस अड्डे का है, जिसे एक पूर्व सैनिक महेंद्र ने बस अड्डे की आत्मकथा के रूप में बयां किया है।
12 साल लंबा इंतजार और कोरे आश्वासन
कागजों पर मोटर नगर बस अड्डा आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित एक मॉडल प्रोजेक्ट है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। पिछले 12 वर्षों से यह बस अड्डा अधूरे वादों, आधे-अधूरे निर्माण और कीचड़ व धूल से भरे गड्ढों के बीच अपनी पहचान तलाश रहा है। सन 1890 में जब अंग्रेजों के आने के साथ यहां रेल और विकास के सपने देखे गए थे, तब किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन इस प्रमुख द्वार की ऐसी दुर्दशा होगी.
आजाद भारत में विकास की कई फाइलें आईं, योजनाएं बनीं और वादों के अंबार लगे। आखिरकार 23 मार्च 2013 को पीपीपी (PPP) मॉडल के तहत इस बस अड्डे के कायाकल्प का रास्ता चुना गया। तब बड़े ही गर्व से यह घोषणा की गई थी कि मार्च 2015 तक यह एक अत्याधुनिक बस अड्डे में बदल जाएगा। लेकिन साल दर साल गुजरते गए और केवल तारीखें बदलीं, जमीन पर हालात जस के तस बने रहे।
विकास के नाम पर क्या बचा है?
आज अगर आप कोटद्वार के इस मोटर नगर बस अड्डे पर जाएंगे, तो आपको विकास के नाम पर केवल तीन स्थायी निशानियां दिखाई देंगी:
- अधूरे पिलर: जो पिछले कई सालों से ऐसे खड़े हैं जैसे किसी बड़े विकास के कंकाल अपनी ही बर्बादी की कहानी सुना रहे हों।
- गहरे गड्ढे: जो बारिश के मौसम में बड़े-बड़े तालाब बन जाते हैं और गर्मियों में राहगीरों के लिए धूल का आंधी बनकर उड़ते हैं।
- ताले और बैरिकेड: जिन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि इस पूरे प्रोजेक्ट के भाग्य पर ही किसी ने हमेशा के लिए ताला लगा दिया है।
इन सबके अलावा अगर कुछ बदलता है, तो वह हैं नेताओं के दौरों के बाद लगने वाले 'घोषणाओं के बड़े-बड़े बैनर'। इन बैनरों को देखकर जनता को कुछ समय के लिए यह जरूर लगता है कि शायद अब कुछ बदलाव होने वाला है, लेकिन धरातल पर सिवाय निराशा के कुछ हाथ नहीं लगता।
नेताओं के दौरे, अधिकारियों की बैठकें और सिर्फ कोरे आश्वासन
इस बस अड्डे के सामने हर रोज एक अजीब और व्यंग्यात्मक दृश्य देखने को मिलता है। भारी-भरकम गाड़ियों में नेता आते हैं, स्थिति का निरीक्षण करते हैं, अधिकारी साथ में फाइलें लेकर आते हैं, और फिर एक औपचारिक बैठक होती है। इसके बाद मीडिया के सामने बयान आता है— 'जल्द ही काम शुरू होगा।'
नेता चले जाते हैं, अधिकारी अपनी फाइलों में व्यस्त हो जाते हैं, लेकिन बस अड्डा वहीं का वहीं खड़ा रहता है। जब आम यात्री, बुजुर्ग, विद्यार्थी या व्यापारी यहां उतरते हैं, तो वे गड्ढों और अधूरे निर्माण को देखकर सिर्फ बुदबुदाते हैं और मायूस होकर आगे बढ़ जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. कोटद्वार का मोटर नगर बस अड्डा कब से अधूरा पड़ा है?
कोटद्वार का मोटर नगर बस अड्डा पिछले 12 वर्षों (मुख्यतः 2013 की पीपीपी घोषणा के बाद से) से अधूरा पड़ा है और आज भी अपने पूरा होने का इंतजार कर रहा है।
2. बस अड्डे के निर्माण में देरी का मुख्य कारण क्या बताया जाता है?
प्रशासन और अधिकारियों द्वारा इसके पीछे पीपीपी (PPP) मॉडल की लंबी प्रक्रिया, ठेकेदारों की औपचारिकताएं और अदालती मामलों का हवाला दिया जाता है, जबकि जनता इन बयानों को टालमटोल मानती है।
3. इस अधूरे बस अड्डे से किसे सबसे ज्यादा परेशानी होती है?
इससे पहाड़ से आने वाले यात्रियों, दैनिक यात्रियों, पूर्व सैनिकों, व्यापारियों, महिलाओं, बुजुर्गों और विद्यार्थियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है।