जब भी हमारे देश में राष्ट्रीय पर्वों और उत्सवों की बात आती है, तो देशभक्ति के तराने, 'वंदे मातरम' और 'जन-गण-मन' गूंजने लगते हैं। स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस, पूरा देश राष्ट्र-प्रेम के रंग में रंगा नजर आता है। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि इस उत्सव के शोर में एक बेहद अहम हिस्सा कहीं पीछे छूट जाता है? हम बात कर रहे हैं भारतीय संविधान की उद्देश्यिका (Preamble) की।
सोचने वाली बात यह है कि देश के शिक्षण संस्थानों, सरकारी कार्यालयों, संसद और विधानसभाओं में राष्ट्रगान और अन्य गीतों को तो पूरे प्रोटोकॉल के साथ गाया और सुना जाता है, लेकिन संविधान की प्रस्तावना या उद्देश्यिका का पाठ सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं होता? आखिर इस अहम दस्तावेज को लेकर यह उदासीनता क्यों बनी हुई है?
उद्देश्यिका: संविधान की आत्मा और भारत का ब्लूप्रिंट
संविधान की उद्देश्यिका केवल कुछ औपचारिक शब्द नहीं हैं, बल्कि यह पूरे संविधान की मंशा और उसके उद्देश्यों का निचोड़ है। यह हमें बताती है कि एक राष्ट्र के रूप में भारत का स्वरूप कैसा होना चाहिए और इसमें हमारा व्यक्तिगत योगदान क्या है। इसकी शुरुआत ही इन शक्तिशाली शब्दों से होती है— 'हम, भारत के लोग...'
यह पंक्ति सीधे तौर पर देश की तमाम जिम्मेदारियों को हम नागरिकों के कंधों पर रखती है। उद्देश्यिका में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि भारत को एक:
- सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न
- समाजवादी
- पंथनिरपेक्ष
- लोकतंत्रात्मक गणराज्य
बनाना है। इसके साथ ही समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता दिलाने तथा व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता व अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ावा देने का संकल्प लिया गया है।
आदर्श और जमीनी हकीकत के बीच की खाई
आज जब हम चारों तरफ नजर दौड़ाते हैं, तो एक कड़वी सच्चाई सामने आती है। संविधान निर्माताओं ने जिस भारत की कल्पना की थी, वह आज की जमीनी हकीकत से कोसों दूर नजर आता है। आज देश सांप्रदायिकता की आग और जातिगत वर्चस्व की लहरों से जूझ रहा है।
समाज में भेदभाव की खाई लगातार चौड़ी हो रही है, और सामंती मानसिकता एक बार फिर सिर उठा रही है। ऐसे में भाईचारे यानी बंधुत्व की भावना की नाव डगमगाती हुई दिखाई दे रही है। सवाल यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है?
"बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि उनका जीवन दर्शन 'समता-स्वतंत्रता-बंधुता' का है, जिसे उन्होंने अपने प्रथम गुरु बुद्ध से ग्रहण किया था। राजनीतिक ध्येय के तौर पर तो हमने इसे स्वीकार कर लिया, लेकिन आज भी सामाजिक जीवन में इसे अपनाने से परहेज किया जाता है।"
अनुच्छेद 13 और सांस्कृतिक क्रांति
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 13 स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि ऐसे सभी रीति-रिवाज, परंपराएं और ग्रंथ जो समता, स्वतंत्रता और बंधुता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हैं, वे संविधान सम्मत न होने की स्थिति में शून्य (अमान्य) माने जाएंगे। यह एक प्रकार की रक्तहीन सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति थी, जिसका उद्देश्य एक समतावादी समाज का निर्माण करना था। हालांकि, आज जो बदलाव समाज में दिख रहे हैं, वे कई बार इस मूल क्रांति की 'प्रतिक्रांति' जैसे प्रतीत होते हैं।
अब आगे क्या करना होगा?
देश के सच्चे पुनर्निर्माण के लिए यह बेहद जरूरी है कि आम नागरिकों के बीच संविधान और उसकी उद्देश्यिका के प्रति जागरूकता को तेजी से बढ़ाया जाए। केवल कागजों पर संविधान को मान लेना काफी नहीं है, बल्कि 'समता, स्वतंत्रता और बंधुता' को अपने दैनिक आचार, विचार और व्यवहार में उतारना होगा। जिस दिन हम इसे अपने जीवन का हिस्सा बना लेंगे, उसी दिन हम यह कह सकेंगे कि हमने संविधान को सच्चे अर्थों में अंगीकृत किया है।
जय भारत, जय संविधान!
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: संविधान की उद्देश्यिका (Preamble) का क्या महत्व है?
उत्तर: उद्देश्यिका संविधान की कुंजी या उसका निचोड़ है। यह देश के आदर्शों, उद्देश्यों (न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुता) और नागरिकों के कर्तव्यों को परिभाषित करती है कि भारत का भविष्य कैसा होना चाहिए।
Q2: 'समता, स्वतंत्रता और बंधुता' के विचार का स्रोत क्या है?
उत्तर: डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि उनका जीवन दर्शन 'समता, स्वतंत्रता और बंधुता' पर आधारित है, जिसे उन्होंने अपने प्रथम बुद्ध के दर्शन से आत्मसात किया था। इसे भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी प्रमुखता से शामिल किया गया है।
Q3: अनुच्छेद 13 का संविधान में क्या काम है?
उत्तर: अनुच्छेद 13 यह सुनिश्चित करता है कि देश में लागू कोई भी ऐसा कानून, रीति-रिवाज या परंपरा जो मूल अधिकारों या संविधान की भावना (समता-स्वतंत्रता-बंधुता) के खिलाफ हो, उसे असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया जाए।