आपने कभी सोचा है कि जिस मिल की चिमनियों से कभी इलाके के विकास का धुआं निकलता था, वह सालों से खामोश पड़ी हो और उसके दोबारा शुरू होने का इंतज़ार अब एक बड़े आंदोलन की शक्ल ले चुका है? उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में इन दिनों कुछ ऐसा ही माहौल बना हुआ है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के शासनकाल में ताले के आगोश में समाई छाता शुगर मिल (Chhata Sugar Mill) को अब दोबारा शुरू कराने की मांग को लेकर अन्नदाताओं का सब्र आखिरकार जवाब दे गया है। पिछले एक हफ्ते से मिल परिसर में चल रहा धरना-प्रदर्शन अब केवल किसानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने एक जन-आंदोलन का रूप धारण कर लिया है।
अन्नादाताओं के समर्थन में उतरे देश के प्रहरी: पूर्व सैनिक परिषद का मोर्चा
इस आंदोलन में एक नया और बेहद मजबूत मोड़ तब आया जब इसमें भूतपूर्व सैनिकों ने एंट्री ली। जी हां, समाजसेवी दीपक शर्मा की अगुवाई में चल रहे इस धरने को अब भूतपूर्व सैनिक परिषद का भी खुला समर्थन मिल गया है। सोमवार को जब सेना की वर्दी से सेवानिवृत्त हुए ये जांबाज छाता शुगर मिल परिसर में किसानों के साथ धरने पर बैठे, तो प्रशासन और शासन के गलियारों में हलचल तेज होना लाजिमी था।
पूर्व सैनिकों का साफ कहना है कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले ये सैनिक जब अपने ही जिले में किसानों को उनके हक के लिए दर-दर भटकते देखते हैं, तो वे चुप नहीं बैठ सकते। इस समर्थन के बाद आंदोलन को और अधिक वैधानिकता और मजबूती मिल गई है। राजनीतिक दलों के नेताओं के बाद अब फौज के अनुशासन वाले इन पूर्व सैनिकों के जुड़ने से यह आंदोलन पूरी तरह से आक्रामक रुख अख्तियार कर चुका है।
आखिर क्यों भड़के हैं किसान? सरकार के दावों पर उठे सवाल
आंदोलन की मुख्य जड़ शासन-प्रशासन के वे दावे हैं जो कागजों पर तो बहुत सुंदर दिखते हैं, लेकिन जमीन पर उनकी कोई हकीकत नजर नहीं आती। किसानों और आंदोलनकारियों का मुख्य सवाल यह है कि:
- जब सरकार और जनप्रतिनिधियों द्वारा छाता शुगर मिल को दोबारा शुरू करने के लिए भारी-भरकम बजट स्वीकृत किए जाने का ढिंढोरा पीटा गया था, तो फिर आज तक धरातल पर एक ईंट भी क्यों नहीं रखी गई?
- स्वीकृत बजट का पैसा आखिर कहां गया? मिल के जीर्णोद्धार का काम शुरू होने में इतनी बड़ी देरी क्यों हो रही है?
- क्या किसानों की रोजी-रोटी से जुड़ा यह मुद्दा सरकारों के लिए सिर्फ चुनावी जुमला बनकर रह गया है?
इन तीखे सवालों ने स्थानीय प्रशासन की नींद उड़ा दी है। किसानों का तर्क है कि जब तक मिल चालू होने की कोई ठोस और लिखित समय-सीमा तय नहीं होती, वे इस परिसर को छोड़कर नहीं हिलेंगे।
विवाद और आरोप: रास्ता रोकने और मारपीट के गंभीर मामले
जैसे-जैसे आंदोलन का दायरा बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इसमें तनाव के बादल भी मंडराने लगे हैं। धरना स्थल पर मिल को समर्थन देने पहुंच रहे युवाओं और स्थानीय लोगों के साथ रास्ते में बदसलूकी और मारपीट किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं।
"आंदोलनकारियों ने सीधा आरोप लगाया है कि इस शांतिपूर्ण धरने को दबाने और कमजोर करने के लिए कुछ अराजक तत्व सक्रिय हो गए हैं। ये तत्व न सिर्फ बाहर से आने वाले युवाओं का रास्ता रोक रहे हैं, बल्कि उनके साथ मारपीट भी कर रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की अभी तक किसी स्वतंत्र एजेंसी या पुलिस द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन इससे इलाके में तनाव का माहौल जरूर बन गया है।"
प्रशासन की बढ़ी धड़कनें, उग्र आंदोलन की चेतावनी
छाता शुगर मिल के बंद होने से मथुरा और आसपास के हज़ारों किसानों की आर्थिक कमर टूट चुकी है। गन्ना किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए दूर-दराज की मिलों के चक्कर काटने पड़ते हैं, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है और मुनाफा शून्य हो जाता है। यही वजह है कि इस धरने में लगातार जनसमर्थन का ग्राफ ऊपर जा रहा है।
स्थिति की नजाकत को भांपते हुए स्थानीय प्रशासन और पुलिस के अधिकारी भी अब पूरी तरह एक्टिव मोड में आ गए हैं। खुफिया तंत्र की नजर पल-पल की गतिविधि पर है। वहीं, भूतपूर्व सैनिक परिषद ने प्रशासन को दो टूक चेतावनी दे डाली है। परिषद के पदाधिकारियों ने ऐलान किया है कि यदि जल्द ही छाता शुगर मिल को चालू करने की दिशा में कोई ठोस, पारदर्शी और निर्णायक कदम नहीं उठाया गया, तो यह धरना समाप्त कर दिया जाएगा और इस आंदोलन को पूरे उत्तर प्रदेश स्तर पर एक उग्र रूप दे दिया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: छाता शुगर मिल वर्तमान में क्यों बंद है?
Ans: मथुरा की छाता शुगर मिल बहुजन समाज पार्टी (BSP) के शासनकाल में घाटे और अन्य प्रशासनिक कारणों के चलते बंद कर दी गई थी, जिसके बाद से यह आज तक चालू नहीं हो पाई है।
Q2: इस आंदोलन में कौन-कौन से संगठन शामिल हो चुके हैं?
Ans: इस आंदोलन की शुरुआत समाजसेवी दीपक शर्मा की अगुवाई में हुई थी। इसके बाद समाजवादी पार्टी (SP) के नेताओं और अब 'भूतपूर्व सैनिक परिषद' ने भी इस धरने को अपना पूर्ण समर्थन दे दिया है।
Q3: आंदोलनकारियों की मुख्य मांग क्या है?
Ans: किसानों और पूर्व सैनिकों की मुख्य मांग है कि शुगर मिल के जीर्णोद्धार के लिए स्वीकृत बजट का उपयोग कर तत्काल प्रभाव से मिल को दोबारा शुरू करने का काम जमीन पर उतारा जाए।