किचन से लेकर आम आदमी की थाली तक महंगाई की एक और भारी चोट पड़ी है। चीनी और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों में आग लगने के बाद अब प्रोटीन का सबसे सस्ता और आम स्रोत माना जाने वाला अंडा भी महंगा हो गया है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, देश के कई हिस्सों में अंडों की कीमतों में करीब 40 प्रतिशत तक का बड़ा उछाल देखने को मिला है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अचानक अंडों के दाम इस तरह क्यों बढ़ गए हैं? इसके पीछे कोई मौसमी बीमारी या पोल्ट्री फार्म में कोई समस्या नहीं, बल्कि इसके तार सीधे सरकारी ऊर्जा नीतियों और 'इथेनॉल' से जुड़े हुए हैं।
अंडे और इथेनॉल का कनेक्शन: आखिर माजरा क्या है?
सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है कि पेट्रोल-डीजल में मिलाने वाले इथेनॉल का भला अंडे की कीमतों से क्या लेना-देना है? लेकिन अर्थशास्त्र और कृषि बाजार के समीकरण कुछ ऐसे ही काम करते हैं। दरअसल, सरकार का जोर देश में हरित ऊर्जा (Green Energy) को बढ़ावा देने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए इथेनॉल के उत्पादन को बढ़ाने पर है।
इथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने (शीरा) और मक्के (Maize) से तैयार किया जाता है। चूंकि चीनी उद्योग से मिलने वाले शीरे की अपनी सीमाएं हैं, इसलिए इथेनॉल का एक बड़ा लक्ष्य मक्के से पूरा किया जा रहा है। देश में डिस्टिलरी फैक्ट्रियों को बड़े पैमाने पर मक्का सप्लाई किया जा रहा है, ताकि इथेनॉल का तयशुदा कोटा पूरा किया जा सके।
पोल्ट्री फार्मिंग पर पड़ी सबसे बड़ी मार
मुर्गियों के दाने (Poultry Feed) का सबसे मुख्य घटक मक्का (Corn) और सोयाबीन होता है। मुर्गियों को सेहतमंद रखने और उनके अंडे देने की क्षमता को बनाए रखने के लिए उन्हें उच्च गुणवत्ता वाला मक्के का दाना खिलाया जाता है।
- मक्के की कमी: जब देश का अधिकांश मक्का डिस्टिलरीज में इथेनॉल बनाने के लिए भेजा जाने लगा, तो खुले बाजार में मक्के की भारी किल्लत पैदा हो गई।
- कीमतों में उछाल: मांग के मुकाबले मक्के की आपूर्ति कम होने के कारण इसके दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए।
- लागत बढ़ना: पोल्ट्री फॉर्म चलाने वालों को अब दाना खरीदने के लिए पहले से दोगुना या बहुत अधिक भुगतान करना पड़ रहा है, जिसका सीधा असर अंडे की फाइनल कीमत पर पड़ा है।
आम आदमी की जेब पर सीधा असर
सर्दियों के मौसम में आमतौर पर अंडों की मांग बढ़ जाती है, लेकिन इस बार गर्मियों और सामान्य दिनों में भी कीमतों में गिरावट नहीं आ रही है। थोक बाजार से लेकर रिटेल मार्केट तक, एक कैरेट अंडे के दाम इतने बढ़ चुके हैं कि अब मध्यम वर्गीय परिवार और हॉस्टल में रहने वाले छात्र भी अपना बजट गड़बड़ाने की बात कह रहे हैं।
पोल्ट्री फेडरेशन से जुड़े जानकारों का कहना है कि अगर सरकार ने मक्के के निर्यात और इथेनॉल के लिए इसके डायवर्जन को लेकर कोई संतुलित नीति नहीं बनाई, तो आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है। केवल अंडे ही नहीं, बल्कि चिकन की कीमतों में भी तेजी आने की पूरी संभावना है क्योंकि दोनों का बेस फीड एक ही है।
क्या कहती है सरकार और नीतियां?
भारत सरकार का यह लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट है कि उसे देश के ऊर्जा आयात के बिल को कम करना है और साल 2025-26 तक पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने के लक्ष्य को हासिल करना है। यह नीति पर्यावरण और देश की अर्थव्यवस्था के मैक्रो लेवल पर भले ही फायदेमंद नजर आती है, लेकिन इसके माइक्रो लेवल पर यानी कृषि और पशुपालन क्षेत्र पर गंभीर दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।
किसानों को मक्के का अच्छा दाम मिल रहा है, इसलिए वे अपनी फसल डिस्टिलरी या बड़े खरीदारों को बेच रहे हैं, जिससे पोल्ट्री सेक्टर के लिए संकट खड़ा हो गया है। खाद्य तेलों और चीनी के बाद अब मक्के आधारित उद्योगों का यह संकट आने वाले समय में महंगाई के एक नए चक्र को जन्म दे सकता है।
