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दिल्ली की भागदौड़ के बीच अचानक कहां गायब हो गया केरल? ओणम पर दिखा अद्भुत नजारा

दिल्ली की भागदौड़ के बीच अचानक कहां गायब हो गया केरल? ओणम पर दिखा अद्भुत नजारा

राजधानी दिल्ली की कंक्रीट की दीवारों और तेज रफ्तार जिंदगी के बीच जब अचानक केले के हरे-भरे पत्तों पर परोसी गई 26 तरह के व्यंजनों की थाली सामने आती है, तो समय जैसे कुछ पल के लिए थम जाता है। पृष्ठभूमि में गूंजती चेंडा मेलम की थाप और हवा में तैरती नारियल के तेल और करी पत्तों की सोंधी खुशबू—यह नजारा किसी दक्षिण भारतीय फिल्म का नहीं, बल्कि दिल्ली के मयूर विहार स्थित उत्तर गुरुवायुरappan मंदिर का है, जहां इस साल ओणम का त्योहार पूरी भव्यता के साथ मनाया गया।

ओणम केवल एक फसल उत्सव नहीं है, बल्कि यह मलयाली संस्कृति, भाईचारे और उत्सवधर्मिता का ऐसा संगम है जो भौगोलिक सीमाओं को पार कर हर दिल को छू लेता है। जब शहर के तमाम लोग अपने दफ्तरों की भागदौड़ से वक्त निकालकर इस पारंपरिक भोज यानी 'ओणम साध्या' का हिस्सा बनने पहुंचे, तो माहौल पूरी तरह से 'केरलम' में बदल चुका था।

मट्टा राइस और साध्या का वह जादुई पहला कौर

केले के पत्ते पर जब साध्या परोसी जाती है, तो उसके अपने कुछ कड़े नियम होते हैं। पत्ते की नोक हमेशा खाने वाले के बाईं ओर होनी चाहिए। शुरुआत नमक, केले के चिप्स (नेथ्री उप्पेरी) और शक्कर से लिपटी गुड़ की वेल्ला वरत्ती से होती है। लेकिन असली जादू तब शुरू होता है जब प्लेट में भाप निकलते लाल 'मट्टा राइस' (Matta Rice) परोसे जाते हैं।

पहला कौर मुंह में जाते ही सांबर, रसम और परिपुंडू कढ़ी का जो मिश्रण स्वाद कलिकाओं पर दस्तक देता है, वह किसी भी खाने के शौकीन को दीवाना बना सकता है। मट्टा राइस का थोड़ा मोटा और अनूठा टेक्सचर, साध्या की ग्रेवी को पूरी तरह से अपने अंदर सोख लेता है, जिससे हर बाइट में एक नया स्वाद मिलता है।

क्या है साध्या की थाली का गणित?

ओणम साध्या कोई आम थाली नहीं है, बल्कि यह केरल की समृद्ध पाक कला का एक वैज्ञानिक दस्तावेज है। इसमें कुल मिलाकर 21 से लेकर 28 तक व्यंजन होते हैं, जो सभी शाकाहारी और लहसुन-प्याज रहित होते हैं। आइए जानते हैं इस थाली के कुछ मुख्य सितारों के बारे में:

  • अवियल (Avial): कटी हुई सब्जियों और पिसे हुए नारियल-दही का यह मिश्रण इस थाली की जान है, जिसे नारियल के कच्चे तेल में पकाया जाता है।
  • एस्सेर्री (Erissey): कद्दू और काले चने से बनने वाली यह ग्रेवी हल्की मीठी और बेहद स्वादिष्ट होती है।
  • कथाक्काली और पाइसम: खाने के अंत में जब गर्म-गर्म 'पालाई प्रधमन्' या 'पल पायसम' (चावल और गुड़ की खीर) परोसी जाती है, तो पूरा भोजन एक दिव्य अनुभव में बदल जाता है।
"दिल्ली में रहकर अपने घर से दूर होने का जो खालीपन होता है, वह ओणम के दिन इस साध्या की थाली को देखकर पूरी तरह भर जाता है। यहाँ का स्वाद बिल्कुल वैसा ही है जैसा हम अपने घर अलप्पुषा या कोच्चि में खाते हैं।" - अनीता नायर, स्थानीय निवासी

दिल्ली में ओणम का बढ़ता क्रेज

पिछले कुछ सालों में दिल्ली-एनसीआर में दक्षिण भारतीय संस्कृति के प्रति लोगों का रुझान तेजी से बढ़ा है। उत्तर गुरुवायुरappan मंदिर, आरके पुरम के मंदिरों और मयूर विहार के सांस्कृतिक केंद्रों में ओणम के दौरान भारी भीड़ देखने को मिलती है। सिर्फ मलयाली समुदाय ही नहीं, बल्कि विभिन्न राज्यों के लोग इस शाकाहारी दावत का लुत्फ उठाने पहुंच रहे हैं।

खास बात यह है कि इस भोज को तैयार करने के लिए विशेष रूप से केरल से अनुभवी शेफ (म्बूथिरी) बुलाए जाते हैं, जो मसालों के संतुलन और शुद्ध नारियल तेल के इस्तेमाल से स्वाद में कोई समझौता नहीं होने देते।

पारंपरिक वेशभूषा और पुक्कलम की छटा

भोजन के अलावा इस उत्सव का एक और बड़ा आकर्षण था 'पुक्कलम' (फूलों की रंगोली)। मंदिर के प्रांगण में गेंदे, चमेली और गुलाब के फूलों से बेहद जटिल और खूबसूरत डिजाइन बनाए गए थे। वहीं, महिलाएं पारंपरिक 'कासावु साड़ी' (सुनहरे बॉर्डर वाली सफेद साड़ी) और पुरुष 'मुंडू' (धोती) में नजर आए। इन दृश्यों ने दिल्ली की आबोहवा में कुछ घंटों के लिए ही सही, लेकिन केरल की मिट्टी की खुशबू घोल दी थी।


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अल्का सिंह

अल्का सिंह

Senior Content Writer (स्वास्थ्य एवं लाइफस्टाइल)

अल्का सिंह स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े विषयों पर गहन शोध के साथ लेखन करती हैं। उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को केवल सामान्य जानकारी ही नहीं, बल...

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