कानपुर में मानसून की पहली या यूं कहें कि महज एक घंटे की बारिश ने नगर निगम के उन दावों की हवा निकाल दी, जिसमें शहर को जलभराव मुक्त बनाने के बड़े-बड़े वादे किए गए थे। कानपुर दक्षिण के व्यस्ततम बाजार गोविंद नगर की मुख्य सड़क कुछ ही मिनटों में किसी तालाब में तब्दील हो गई। इस नजारे को देखकर आम जनता तो परेशान हुई ही, लेकिन राजनीति गरमाने में भी देर नहीं लगी। विरोध जताने का यह अनोखा तरीका अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है।
बाथटब को बना डाला नाव, अनोखे अंदाज में प्रदर्शन
जलभराव की समस्या के खिलाफ अनोखा विरोध प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस नेता विकास अवस्थी ने गजब का तरीका निकाला। उन्होंने एक बाथटब को ही नाव की शक्ल दे दी और उसे पानी से लबालब भरी सड़क पर उतार दिया। इस बाथटब वाली नाव पर बैठकर उन्होंने न सिर्फ नगर निगम और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की, बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली पर भी तीखे सवाल खड़े किए।
कांग्रेस नेता का यह वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे पानी के बीच टब में बैठे नजर आ रहे हैं। उनके समर्थकों ने आरोप लगाया कि नाला सफाई के नाम पर सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए गए और धरातल पर कुछ भी काम नहीं हुआ।
करोड़ों के बजट का बंदरबांट और नाला सफाई का सच
शहर में जल निकासी और नालों की सफाई के लिए नगर निगम ने करोड़ों रुपये का भारी-भरकम बजट पास किया था। इसके बावजूद मामूली बारिश में शहर का डूब जाना कई बड़े सवाल खड़े करता है। विकास अवस्थी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि जनता के टैक्स के पैसों का किस तरह से दुरुपयोग हो रहा है, यह इस जलभराव को देखकर साफ अंदाजा लगाया जा सकता है।
उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि समय रहते जल निकासी के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए, तो आने वाले दिनों में आम जनता भी इसी तरह सड़कों पर टब और नाव लेकर उतरने को मजबूर हो जाएगी।
पहले भी सामने आ चुकी है फर्मों की लापरवाही
कानपुर में नाला सफाई के नाम पर हुए खेल का खुलासा पहले भी हो चुका है। जांच के दौरान यह बात सामने आई थी कि टेंडर लेने वाली कार्यदायी संस्थाओं ने भारी लापरवाही बरती है। इस खुलासे के बाद नगर निगम प्रशासन ने कड़ी कार्रवाई करते हुए:
- 10 ठेकेदार फर्मों को ब्लैक लिस्ट कर दिया, जिनमें आशिका ट्रेडर्स, मां बाला देवी कंस्ट्रक्शन, अनमोल एंटरप्राइजेज, आद्रिका एंटरप्राइजेज और संजय शर्मा जैसी कंपनियां शामिल हैं।
- वहीं, 8 कंपनियों को डिबार घोषित किया गया, जिसमें एमके ट्रेडर्स, कनक कंस्ट्रक्शन, और पेसिफिक एंटरप्राइजेज के नाम प्रमुख हैं।
इतनी बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई के बावजूद भी अगर धरातल पर सुधार नहीं दिख रहा है, तो इसका मतलब साफ है कि कागजी कार्रवाई और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क है.
मुख्यमंत्री की नाराजगी का भी नहीं हुआ असर?
यह पूरा मामला तब और गंभीर हो जाता है जब हम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त रुख को याद करते हैं। कुछ समय पहले ही सीएम योगी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई उच्चस्तरीय बैठक में कानपुर नगर निगम की कार्यशैली पर गहरी नाराजगी जताई थी।
मुख्यमंत्री ने विशेष तौर पर जलभराव, सड़कों की जर्जर हालत, ठेकों में कथित माफियागिरी और अवैध वसूली को लेकर अधिकारियों को खरी-खोटी सुनाई थी और सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद स्थानीय अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है।
अब आगे क्या?
जब सूबे के मुखिया की चेतावनी के बाद भी अधिकारी अपनी कार्यशैली में सुधार करने को तैयार नहीं हैं, तो विपक्ष को हमलावर होने का पूरा मौका मिल रहा है। कानपुर की जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि आखिर इन लापरवाह अधिकारियों पर नकेल कसने के लिए सरकार को और कितने कड़े कदम उठाने पड़ेंगे। फिलहाल, कानपुर का यह 'बाथटब प्रोटेस्ट' राजनीतिक गलियारों से लेकर आम लोगों की चर्चाओं के केंद्र में बना हुआ है।
