इस्लामाबाद के एक बड़े अस्पताल में बीती रात उस समय कोहराम मच गया, जब अचानक नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई (NICU) में आग भड़क उठी। इस दर्दनाक और दिल दहला देने वाली घटना में कम से कम 14 मासूम नवजातों की जलकर और दम घुटने से मौत हो गई है। इस हृदयविदारक हादसे ने एक बार फिर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था और अस्पतालों में सुरक्षा मानकों की पोल खोलकर रख दी है।
अचानक शॉर्ट सर्किट से फैली आग
प्राथमिक जांच रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आग की शुरुआत अस्पताल की इमारत की पहली मंजिल पर बने एनआईसीयू (NICU) वार्ड से हुई। शुरुआती संकेत यही इशारा कर रहे हैं कि आग लगने की मुख्य वजह शॉर्ट सर्किट थी। वार्ड में ऑक्सीजन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल उपकरणों की भरमार होने के कारण आग ने पलक झपकते ही विकराल रूप धारण कर लिया।
देखते ही देखते पूरा वार्ड जहरीले धुएं से भर गया। नवजात बच्चे जो पहले से ही वेंटिलेटर या अन्य जीवन रक्षक प्रणालियों पर थे, वे अपनी जान बचाने के लिए खुद हिल भी नहीं सकते थे। जब तक अस्पताल का स्टाफ और दमकल विभाग मौके पर पहुंचता, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
राहत और बचाव कार्य में आई अड़चनें
स्थानीय प्रशासन और दमकल विभाग को जैसे ही इस आपदा की सूचना मिली, राहत गाड़ियों को तुरंत रवाना किया गया। हालांकि, अस्पताल के भीतर फैल रहे घने धुएं और अफरा-तफरी के माहौल के कारण बचाव अभियान में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
- दमकल की गाड़ियां: आग बुझाने के लिए दमकल की 6 से अधिक गाड़ियों को लगाया गया था।
- धुएं का गुबार: एनआईसीयू वार्ड छोटा होने और खिड़कियां बंद होने के कारण धुआं बाहर नहीं निकल पाया, जिससे बच्चों का दम घुट गया।
- स्टाफ की भूमिका: कुछ नर्सों और डॉक्टरों ने अपनी जान जोखिम में डालकर कुछ बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाला, लेकिन अधिकांश बच्चे आग की चपेट में आ चुके थे।
परिजनों का फूटा गुस्सा, अस्पताल प्रशासन पर लापरवाही का आरोप
इस भीषण त्रासदी की खबर मिलते ही अपने बच्चों को खोने वाले माता-पिता और परिजन अस्पताल के बाहर इकट्ठा हो गए। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। अस्पताल के बाहर का माहौल बेहद गमगीन और तनावपूर्ण है। लोगों ने अस्पताल प्रशासन के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया और गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं।
"हमने अपने जिगर के टुकड़े को इलाज के लिए यहां छोड़ा था, यह सोचकर कि वह ठीक होकर घर लौटेगा। हमें क्या पता था कि अस्पताल हमारे बच्चे की जान ले लेगा। यहां आग से निपटने का कोई इंतजाम नहीं था।" - एक पीड़ित पिता का बयान।
"वार्ड में फायर ब्रिगेड के उपकरण काम नहीं कर रहे थे और न ही समय पर अलार्म बजा। अगर थोड़ी भी सतर्कता बरती जाती, तो इतने मासूमों की जान बचाई जा सकती थी।" - एक अन्य स्थानीय नागरिक
सरकार और प्रशासन की प्रतिक्रिया
इस गंभीर हादसे के बाद देश के उच्च अधिकारियों में हड़कंप मच गया है। संबंधित मंत्रालय ने इस घटना का तुरंत संज्ञान लेते हुए एक उच्च स्तरीय जांच समिति (High-Level Inquiry Committee) के गठन का आदेश दिया है। समिति को निर्देश दिए गए हैं कि वह 48 घंटों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपे, ताकि यह पता लगाया जा सके कि लापरवाही कहां और किस स्तर पर हुई थी।
साथ ही, सरकार ने मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है और दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई करने का भरोसा दिलाया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या मुआवजे की रकम या किसी अधिकारी के निलंबित होने से उन माता-पिता की गोद कभी भर पाएगी जिन्होंने अपने नवजात बच्चे को खो दिया है?
अस्पतालों में सुरक्षा मानकों पर बड़ा सवाल
यह घटना दुनिया भर के अस्पतालों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। देश के कई सरकारी और निजी अस्पतालों में आज भी पुराने हो चुके बिजली के तारों और लचर फायर सेफ्टी सिस्टम के सहारे मरीजों की जान दांव पर लगाई जा रही है। एनआईसीयू (NICU) जैसे संवेदनशील वार्डों में जहां नवजात शिशु अपनी जिंदगी की पहली सांसें ले रहे होते हैं, वहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होना आपराधिक लापरवाही के समान है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे वार्डों में आग से सुरक्षा के लिए ऑटोमैटिक स्प्रिंकलर सिस्टम, स्मोक डिटेक्टर्स और एडवांस फायर अलार्म होना अनिवार्य किया जाना चाहिए। साथ ही, हर महीने इन उपकरणों की टेस्टिंग होनी चाहिए ताकि किसी भी अनहोनी को समय रहते टाला जा सके।
