भारतीय संसद ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को अपनी अंतिम मंजूरी दे दी है। लोकसभा में पारित होने के बाद आज राज्यसभा ने भी विपक्ष के भारी हंगामे और विरोध के बीच इस संशोधन बिल को पास कर दिया। हालांकि, कानून बनने की प्रक्रिया पूरी होते ही इस पर देश भर में नई बहस छिड़ गई है।
विधेयक में क्या-क्या बदला? जानिए मुख्य प्रावधान
नया संशोधन कानून ट्रांसजेंडर समुदाय की परिभाषा को पूरी तरह से एक जैविक (Biological Framework) और मेडिकल आधार में बांधता है। इसमें सबसे बड़ा बदलाव खुद को ट्रांसजेंडर घोषित करने (Self-Perceived Gender Identity) के अधिकार को समाप्त करना है।
- मेडिकल और जैविक आधार: अब पहचान का आधार शारीरिक और इंटरसेक्स (Intersex) विविधताओं पर निर्भर करेगा।
- प्रमाणपत्र की अनिवार्यता: किसी व्यक्ति की पहचान अब उसकी व्यक्तिगत भावना से तय नहीं होगी। इसके लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) की सिफारिश और जिला मजिस्ट्रेट (DM) द्वारा जारी आधिकारिक प्रमाणपत्र अनिवार्य होगा।
- कई पहचानें दायरे से बाहर: इस संशोधन के जरिए कई सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों और ट्रांसमैस्कुलिन (Transmasculine) व्यक्तियों को कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया है।
सरकार का पक्ष: 'फर्जीवाड़े पर लगेगी रोक'संसद में चर्चा का जवाब देते हुए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने कहा कि सरकार ट्रांसजेंडर समुदाय के कल्याण और सम्मान के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कानून का मकसद वास्तविक हकदारों को अधिकार देना और समाज की मुख्यधारा में शामिल करना है।
भाजपा सांसद मेधा विश्राम कुलकर्णी ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा,
"यह कानून जन्म से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को उनका वाजिब हक दिलाएगा। इससे फर्जी पहचान बनाकर सरकारी सुविधाओं का गलत फायदा उठाने वालों पर लगाम लगेगी और आपराधिक घटनाओं में कमी आएगी।"
विपक्ष का तीखा हमला: 'संवैधानिक अधिकारों का हनन'
विपक्ष ने विधेयक के प्रावधानों को असंवैधानिक और अपमानजनक बताते हुए इसका कड़ा विरोध किया:
- रेणुका चौधरी (कांग्रेस): उन्होंने कहा कि नौकरशाही और प्रशासनिक प्रमाणपत्र के जरिए किसी की पहचान तय करना निजता के अधिकार का हनन है। यह सुप्रीम कोर्ट के 2014 के ऐतिहासिक 'नालसा' (NALSA) फैसले की भावना के खिलाफ है।
- तिरुचि शिवा (DMK): उन्होंने चेतावनी दी कि यह बिल संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन करता है और इसे अदालत में चुनौती दिए जाने पर रद्द कर दिया जाएगा।
- साकेत गोखले (TMC): उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए चिंता जताई कि भारत में 31% ट्रांसजेंडर लोग सामाजिक भेदभाव के कारण आत्महत्या का प्रयास करते हैं, और यह कानून उनकी मुश्किलों को और बढ़ाएगा।
- जॉन ब्रिटास व जया बच्चन: सीपीआई(एम) के जॉन ब्रिटास ने इसे देश को 100 साल पीछे ले जाने वाला 'काला दिन' कहा, जबकि सपा सांसद जया बच्चन ने बिना गहन विचार-विमर्श के इतनी जल्दबाजी में बिल लाने पर सवाल खड़े किए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026 में सबसे बड़ा बदलाव क्या है?
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब कोई व्यक्ति स्वयं को ट्रांसजेंडर घोषित नहीं कर सकता। पहचान पत्र पाने के लिए मेडिकल बोर्ड और जिला मजिस्ट्रेट (DM) की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है।
2. विपक्ष इस बिल का विरोध क्यों कर रहा है?
विपक्ष का मानना है कि मेडिकल जांच और सरकारी प्रमाणपत्र की अनिवार्यता ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की गरिमा, निजता और स्व-निर्धारण के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है।
3. सुप्रीम कोर्ट के NALSA फैसले का इससे क्या संबंध है?
2014 के NALSA फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हर व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान (Gender Identity) खुद चुनने का अधिकार दिया था। विरोधियों का कहना है कि यह नया संशोधन उस फैसले की मूल भावना को कमजोर करता है।