देश के भीतर बढ़ती चीनी की कीमतों और संभावित किल्लत से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एक बेहद अहम और बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने बिना किसी आयात शुल्क (ड्यूटी फ्री) के चीनी के आयात की इजाजत दे दी है। इस फैसले के बाद से राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस नीति पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने सवाल उठाया है कि आखिर जब गन्ने का इस्तेमाल धड़ल्ले से इथेनॉल बनाने में किया जा रहा है, तो फिर आम आदमी की रसोई के लिए चीनी की कमी क्यों पड़ रही है?
कहा जा रहा है कि देश में चीनी की कोई कमी नहीं, फिर आयात क्यों?
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) और सरकार के बीच चल रही बैठकों के बाद यह फैसला सामने आया है। एक तरफ जहां सरकार घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने और महंगाई पर लगाम कसने के लिए बाहर से चीनी मंगाने की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इस बात को लेकर आक्रामक है कि नीतियों में तालमेल की कमी का खामियाजा अंततः किसानों और आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।
अरविंद केजरीवाल ने अपने बयान में सीधे तौर पर सरकार की उस नीति पर सवाल खड़े किए जिसके तहत चीनी मिलों और गन्ने के रस को सीधे इथेनॉल में बदला जा रहा है। उनका कहना है कि अगर देश का सारा गन्ना और चीनी इथेनॉल ब्लेंडिंग के जरिए गाड़ियों के टैंक में झोंक दी जाएगी, तो फिर देश के नागरिकों को अपनी चाय और भोजन में इस्तेमाल होने वाली चीनी के लिए आयात का मोहताज होना ही पड़ेगा।
क्या है इथेनॉल ब्लेंडिंग और उसका चीनी बाजार पर असर?
- पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण: भारत सरकार ने कार्बन उत्सर्जन को कम करने और क्रूड ऑयल के आयात पर निर्भरता घटाने के लिए पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का बड़ा लक्ष्य रखा है।
- गन्ने का डायवर्जन: इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए देश की चीनी मिलों ने गन्ने के रस और बी-हेवी मोलासेस (शीरा) का एक बड़ा हिस्सा सीधे इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
- उत्पादन में गिरावट: गन्ने के इस बड़े हिस्से के इथेनॉल में डायवर्ट होने की वजह से देश में चीनी का कुल उत्पादन उम्मीद से कम दर्ज किया गया, जिससे बाजार में कृत्रिम या वास्तविक किल्लत की स्थिति पैदा हो गई।
बाजार पर इसका क्या असर पड़ेगा?
ड्यूटी फ्री चीनी आयात की अनुमति मिलने से अंतरराष्ट्रीय बाजार से चीनी तेजी से भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचेगी। इससे घरेलू थोक और खुदरा बाजारों में कीमतों पर ऊपरी दबाव कम हो सकता है। त्योहारी सीजन से पहले सरकार की यह कोशिश है कि महंगाई आम आदमी की पहुंच से बाहर न जाए। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम से देश के गन्ना किसानों को उनकी उपज का सही और प्रतिस्पर्धी मूल्य मिलने में बाधा आ सकती है, क्योंकि बाहर से आने वाली सस्ती चीनी स्थानीय बाजार के समीकरण बिगाड़ सकती है।
किसानों और मिल मालिकों की अपनी दलीलें
दूसरी ओर, चीनी मिल संघों का तर्क है कि इथेनॉल नीति देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों से निपटने के लिए यह जरूरी है। मिल मालिकों का यह भी कहना है कि वे सरकार के दिशानिर्देशों के तहत ही काम कर रहे हैं और गन्ने से इथेनॉल बनाने पर उन्हें बेहतर रिटर्न मिल रहा है, जिससे वे किसानों का बकाया भुगतान समय पर कर पा रहे हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने में कहीं कोई चूक हो रही है? अगर देश की कृषि भूमि का एक बड़ा हिस्सा गन्ने की खेती के लिए इस्तेमाल हो रहा है और उस गन्ने से चीनी की बजाय सिर्फ ईंधन बनाया जा रहा है, तो देश को मीठे के लिए आयात पर निर्भर होना ही पड़ेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. सरकार ने ड्यूटी फ्री चीनी आयात की अनुमति क्यों दी है?
घरेलू बाजार में चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने और भविष्य में किसी भी संभावित किल्लत से निपटने के लिए सरकार ने बिना आयात शुल्क के चीनी मंगाने की छूट दी है।
2. अरविंद केजरीवाल ने इस नीति पर क्या आपत्ति जताई है?
उनका मुख्यत: यह कहना है कि जब गन्ने के एक बड़े हिस्से का इस्तेमाल सिर्फ इथेनॉल बनाने में किया जा रहा है, तो देश में चीनी की कमी होना स्वाभाविक है। सरकार को अपनी प्राथमिकताओं स्पष्ट करनी चाहिए।
3. क्या इस फैसले से चीनी की कीमतें कम होंगी?
हां, भारी मात्रा में ड्यूटी फ्री चीनी के आयात से बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी, जिससे खुदरा और थोक बाजारों में कीमतों पर लगाम लगने की उम्मीद है।