अगर आप या आपका कोई परिचित क्रोनिक हेपेटाइटिस B से पीड़ित है, तो केवल लिवर की रिपोर्ट नॉर्मल आना ही पूरी तरह बेफिक्र होने की वजह नहीं हो सकती। एक चौकाने वाले वैश्विक अध्ययन में सामने आया है कि हेपेटाइटिस B के मरीजों में अगर मेटाबॉलिक डिस्फंक्शन से जुड़ा फैटी लिवर (MASLD) भी मौजूद है, तो उनके लिए दिल की बीमारियों और कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
13.7 साल तक चली स्टडी में हुआ बड़ा खुलासा
बायोमेडिकल एंड एनवायरनमेंटल साइंसेज में प्रकाशित इस लॉन्ग-टर्म रिसर्च में 3,269 क्रोनिक हेपेटाइटिस B मरीजों के स्वास्थ्य का लगभग 13.7 वर्षों तक अध्ययन किया गया। शोध की शुरुआत में ही करीब 26.5% मरीजों में MASLD (फैटी लिवर) पाया गया। इन लोगों में मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और टाइप-2 डायबिटीज जैसी समस्याएं पहले से अधिक देखी गईं।
चौंकाने वाले आंकड़े: बीमारियों का बढ़ा रिस्क
- कार्डियोवैस्कुलर रिस्क में 98% की बढ़ोतरी: फैटी लिवर से जूझ रहे हेपेटाइटिस B मरीजों में हार्ट अटैक, इसकेमिक स्ट्रोक और हेमरेजिक स्ट्रोक का खतरा 98% अधिक पाया गया।
- अन्य कैंसर का खतरा (50% से 98% वृद्धि): अध्ययन के अनुसार, लिवर के अलावा शरीर के अन्य हिस्सों में होने वाले कैंसर (Extrahepatic Cancers) का जोखिम भी 50% से 98% तक बढ़ गया।
- 12 साल में कार्डियोवैस्कुलर घटनाएं: MASLD वाले मरीजों में दिल से जुड़ी बीमारियों की दर 9.4% दर्ज की गई, जबकि बिना MASLD वाले मरीजों में यह महज 4.9% थी।
रिपोर्ट नॉर्मल आए तब भी बना रहता है खतरा
इस रिसर्च की सबसे डराने वाली बात यह है कि जिन मरीजों के लिवर एंजाइम (ALT) बिल्कुल सामान्य थे या जिनमें फैटी लिवर हल्का (Mild) था, उनमें भी दिल की बीमारियों का रिस्क काफी ज्यादा बना रहा।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि अगर इलाज या लाइफस्टाइल में बदलाव से किसी मरीज का फैटी लिवर ठीक (Reverse) भी हो गया, तब भी उनके शरीर में कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों का जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में दोगुना ही रहा।
मरीजों और डॉक्टरों को अब क्या करना चाहिए?
अब तक माना जाता था कि हेपेटाइटिस B के इलाज में सिर्फ वायरस (HBV DNA) को नियंत्रित करना ही काफी है। लेकिन इस स्टडी ने साबित कर दिया है कि केवल वायरस कंट्रोल करने से काम नहीं चलेगा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि हेपेटाइटिस B के मरीजों को अपनी मेटाबॉलिक हेल्थ पर तुरंत ध्यान देना चाहिए। ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और वजन को कंट्रोल में रखना उतना ही जरूरी है जितना कि लिवर की दवाएं लेना। नियमित कार्डियोवैस्कुलर जांच से भविष्य में होने वाले बड़े दौरों और कैंसर के जोखिम से बचा जा सकता है।