उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। किसान नेता दिग्विजय भाटी ने पुलिस प्रशासन पर बेहद गंभीर और अमानवीय आरोप लगाए हैं। भाटी का दावा है कि पुलिस हिरासत के दौरान उन्हें न केवल बेरहमी से पीटा गया (थर्ड डिग्री टॉर्चर), बल्कि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए एक लोकप्रिय फिल्मी गाने 'चोली के पीछे क्या है' पर नाचने के लिए भी मजबूर किया गया।
क्या है पूरा मामला और कैसे सामने आया सच?
यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब किसान नेता दिग्विजय भाटी अपनी शिकायत लेकर सीधे वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) कार्यालय पहुंचे। उनके साथ समर्थकों की एक लंबी भीड़ भी थी, जिससे यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है। भाटी का आरोप है कि कुछ समय पहले जब वह किसी स्थानीय मुद्दे को लेकर आंदोलनरत थे, तब पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था।
हिरासत के दौरान थाने के भीतर जो कुछ हुआ, वह कानून के रखवालों की कार्यशैली पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है। किसान नेता का कहना है कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें शारीरिक रूप से तोड़ने के लिए हर मुमकिन कोशिश की और जब इतने से भी मन नहीं भरा, तो उनका मजाक उड़ाने के लिए उन्हें अजीबोगरीब हरकतें करने को कहा गया।
'थर्ड डिग्री' और मानसिक प्रताड़ना के गंभीर आरोप
भारतीय न्याय व्यवस्था में पुलिस हिरासत का एक तय कानूनी दायरा होता है, जिसके तहत आरोपी या संदिग्ध के मानवाधिकारों की रक्षा करना अनिवार्य है। लेकिन दिग्विजय भाटी के खुलासे ने एक बार फिर पुलिस कस्टडी में होने वाले टॉर्चर की पुरानी और डरावनी यादों को ताजा कर दिया है।
भाटी ने मीडिया और अधिकारियों के सामने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि:
- शारीरिक हिंसा: उन्हें गुप्त कमरों में ले जाकर ऐसी जगह मारा गया जिससे शरीर पर गंभीर निशान न आएं, जिसे आम भाषा में थर्ड डिग्री टॉर्चर कहा जाता है।
- मानसिक उत्पीड़न: पुलिसकर्मियों ने उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने के लिए उन्हें गालियां दीं और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया।
- डांस कराने का दबाव: हद तो तब हो गई जब अधिकारियों के सामने उन्हें 'चोली के पीछे क्या है' गाने पर ठुमके लगाने के लिए मजबूर किया गया। ऐसा करके उन्हें सार्वजनिक रूप से बेइज्जत करने की साजिश रची गई थी।
प्रशासनिक हलचल और जांच की मांग
इस सनसनीखेज खुलासे के बाद मेरठ पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया है। हालांकि, घटना के वक्त तैनात रहे तत्कालीन एसएसपी और अन्य संबंधित पुलिसकर्मियों की ओर से इस मामले में अभी तक कोई आधिकारिक और विस्तृत बयान सामने नहीं आया है, लेकिन अंदरखाने जांच शुरू होने की सुगबुगाहट तेज हो गई है।
किसान संगठनों ने इस घटना को किसानों की आवाज को दबाने की एक सोची-समझी साजिश करार दिया है। उनका कहना है कि यदि एक जाने-माने किसान नेता के साथ इस तरह का अमानवीय सलूक किया जा सकता है, तो आम आदमी की सुरक्षा का क्या हाल होगा? संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि इस मामले में लिप्त पुलिसकर्मियों के खिलाफ जल्द से जल्द कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, तो वे एक बड़ा आंदोलन शुरू करेंगे।
मानवाधिकारों का हनन और कानूनी पहलू
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दिग्विजय भाटी द्वारा लगाए गए आरोप सच साबित होते हैं, तो यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों और मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम का खुला उल्लंघन है। पुलिस का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना है, न कि किसी नागरिक को मानसिक और शारीरिक रूप से इस हद तक प्रताड़ित करना कि उसका आत्मबल ही टूट जाए।
फिलहाल, एसएसपी ऑफिस में दी गई शिकायत के आधार पर उच्चाधिकारियों ने मामले की निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया है। जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या खाकी के इन कथित दागदार चेहरों पर कोई सख्त कार्रवाई होगी या यह मामला भी कागजों में ही दफन हो जाएगा।
