सूरज की पहली किरण भी ठीक से खिली नहीं होती कि उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले की एक खास सड़क पर इंसानी उम्मीदों का बाजार सज जाता है। पड़ाव से रामनगर की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित ग्राम सभा चौरहठ सुबह होते ही किसी युद्ध के मैदान जैसा नजर आने लगता है, जहां मुकाबला रोटी, रोजी और अस्तित्व का होता है। यह सिर्फ एक सड़क का चौराहा नहीं है, बल्कि इस पूरे इलाके की सबसे बड़ी लेबर मंडी है, जहां हर सुबह सैकड़ों हाथ काम की तलाश में आसमान की तरफ टकटकी लगाए खड़े रहते हैं।
चार पैसे की इनकम और जिंदगी की जद्दोजहद
सुबह के करीब सात बज रहे हैं। ठंड हो या कड़ाके की धूप, इस चौराहे पर माथे पर गमछे बांधे, हाथों में तसले और फावड़े लिए मजदूरों का हुजूम जुटने लगता है। हर कोई इस आस में खड़ा है कि कोई ठेकेदार या मकान मालिक आएगा और उसे दिनभर के लिए काम पर ले जाएगा। यह नजारा सिर्फ एक आर्थिक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह उन तमाम कहानियों का जीवंत दस्तावेज है जो पेट की आग बुझाने के लिए रोज घर से निकलते हैं।
यहाँ आने वाले हर शख्स की अपनी मजबूरी है। किसी को बेटी की शादी के लिए पैसे जोड़ने हैं, तो किसी को बूढ़े मां-बाप की दवाइयों का खर्च उठाना है। चार पैसे की इनकम के लिए यहां लोग अपनी जिंदगी और पसीने का सौदा करने को मजबूर हैं।
कैसे चलती है यह लेबर मंडी?
भदोही-रामनगर मार्ग पर स्थित यह चौराहा रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। आसपास के ग्रामीण इलाकों से आने वाले श्रमिक यहां सुबह-सुबह इकट्ठा होते हैं। जैसे ही कोई चार पहिया वाहन या ठेकेदार की पिकअप गाड़ी रुकती है, मजदूरों की भीड़ उस ओर दौड़ पड़ती है।
- समय: मंडी का मुख्य समय सुबह 6:30 बजे से 9:30 बजे तक होता है।
- पेशा: राजमिस्त्री, बेलदार, पेंटर, और सामान्य मजदूरी करने वाले लोग यहां आते हैं।
- भुगतान: दिहाड़ी आमतौर पर काम की प्रकृति और कौशल के आधार पर तय होती है।
असुरक्षित भविष्य और अनिश्चितता का साया
इस लेबर मंडी की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि यहां काम मिलने की कोई गारंटी नहीं होती। कई बार मजदूर सुबह से दोपहर तक खड़े रहते हैं और बिना एक भी रुपया कमाए मायूस होकर घर लौटते हैं। इस अनिश्चितता के कारण उनके घरों में चूल्हा जलना भी मुश्किल हो जाता है।
चौराहे पर खड़े एक बुजुर्ग मजदूर रामू (बदला हुआ नाम) बताते हैं, "साहब, उम्र ढल चुकी है, इसलिए अब हर कोई काम पर नहीं रखता। सुबह आते हैं कि शायद आज कुछ मिल जाए, जिससे बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके। अगर खाली हाथ लौटे, तो शाम को चूल्हा ठंडा रहता है।"
सरकारी योजनाओं और दावों की जमीनी हकीकत
सरकार भले ही असंगठित क्षेत्र के मजदूरों (Unorganized Workers) के लिए तमाम कल्याणकारी योजनाएं चलाने का दावा करती हो, लेकिन इस चौराहे की तस्वीर कुछ और ही कहती है। अधिकांश मजदूरों के पास न तो श्रम कार्ड का सही लाभ पहुंच पाता है और न ही उन्हें न्यूनतम मजदूरी की सुरक्षा मिलती है। बीच-बीच में ठेकेदारों द्वारा मेहनताना कम दिए जाने की शिकायतें भी आम हैं।
जरूरी है ठोस कदम
चंदौली का यह ग्राम सभा चौराहा सिर्फ मजदूरों की मंडी नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के उस आर्थिक पिछड़ेपन का आईना है जिसे दूर करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। यदि इन श्रमिकों के लिए कौशल विकास, निश्चित रोजगार के अवसर और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का दायरा बढ़ाया जाए, तो शायद इस मंडी की लाचारी कुछ हद तक कम हो सकेगी।
