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134 साल पुराना कावेरी जल विवाद: क्यों फिर आमने-सामने आए कर्नाटक और तमिलनाडु?

134 साल पुराना कावेरी जल विवाद: क्यों फिर आमने-सामने आए कर्नाटक और तमिलनाडु?

दक्षिण भारत की दो बड़ी नदियों में शुमार कावेरी का पानी एक बार फिर सियासी और कानूनी गलियारों में उबाल ला रहा है। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच चला आ रहा 134 साल पुराना जल विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच चुका है। तमिलनाडु सरकार ने अपने हिस्से का पानी समय पर न मिलने का आरोप लगाते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया है, जिसके बाद अदालत ने दोनों राज्यों से विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट तलब की है।

आखिर क्या है कावेरी जल विवाद और क्यों भड़की है नई आग?

हाल ही में कावेरी जल विनियमन समिति ने कर्नाटक को निर्देश दिया था कि वह 29 जुलाई से लगातार 15 दिनों तक हर दिन 3,500 क्यूसेक पानी तमिलनाडु के लिए छोड़े। लेकिन, तमिलनाडु का कहना है कि उसे यह पानी नहीं मिला। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से तुरंत हस्तक्षेप की गुहार लगाई। यह विवाद केवल दो राज्यों की तनातनी नहीं है, बल्कि यह भारत के सबसे पुराने और जटिल अंतरराज्यीय नदी जल विवादों में से एक है, जिसमें कर्नाटक और तमिलनाडु के अलावा केरल और पुडुचेरी भी शामिल हैं।

कावेरी नदी इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

कर्नाटक के कोडगु जिले के पश्चिमी घाट से निकलने वाली कावेरी नदी जब तमिलनाडु में प्रवेश करती है, तो वहां की कृषि व्यवस्था की जीवनरेखा बन जाती है। तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में धान की खेती पूरी तरह इसी नदी के पानी पर निर्भर है। दूसरी तरफ, कर्नाटक के लिए यह नदी न केवल किसानों की सिंचाई का साधन है, बल्कि बेंगलुरु जैसे महानगर की प्यास बुझाने का भी मुख्य जरिया है। यही वजह है कि जब भी मानसून कमजोर होता है, दोनों राज्यों के बीच पानी की यह लड़ाई और तेज हो जाती है।

ब्रिटिश काल से जुड़ी हैं इस विवाद की जड़ें

इस विवाद का इतिहास बहुत पुराना है। इसकी जड़ें ब्रिटिश शासनकाल तक जाती हैं:

  • साल 1892 समझौता: मैसूर रियासत (आज का कर्नाटक) और मद्रास प्रेसीडेंसी (आज का तमिलनाडु) के बीच पहला बड़ा समझौता हुआ, जिसके तहत मैसूर को नई सिंचाई परियोजनाओं के लिए मद्रास की अनुमति लेनी पड़ती थी।
  • साल 1924 समझौता: यह समझौता 50 वर्षों के लिए था, जिसके तहत कृष्णराज सागर और मेट्टूर बांध जैसी बड़ी परियोजनाओं का विकास हुआ। 1974 में इसकी अवधि समाप्त होने के बाद विवाद और गहरा गया।
  • वर्ष 2007 न्यायाधिकरण: केंद्र सरकार द्वारा गठित कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण ने लंबा इंतजार कराने के बाद 2007 में पानी के बंटवारे का फैसला सुनाया।
  • साल 2018 सुप्रीम कोर्ट का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले में थोड़ा बदलाव करते हुए कर्नाटक का हिस्सा बढ़ाकर 284.75 टीएमसी और तमिलनाडु का हिस्सा 404.25 टीएमसी तय किया। (इसके अलावा केरल के लिए 30 टीएमसी और पुडुचेरी के लिए 7 टीएमसी तय हुआ)।

दोनों राज्यों के अपने-अपने तर्क

पानी के इस संकट पर दोनों राज्यों की दलीलें अपनी-अपनी जगह मजबूत दिखती हैं:

तमिलनाडु का पक्ष: राज्य का तर्क है कि कावेरी डेल्टा के करोड़ों किसान पूरी तरह इस पानी पर निर्भर हैं। यदि सही समय पर पानी नहीं मिला, तो फसलें बर्बाद हो जाएंगी। इसके अलावा, अदालत और समितियों के आदेशों का पालन होना अनिवार्य है।
कर्नाटक का पक्ष: कर्नाटक का कहना है कि जब पुराने समझौते हुए थे, तब राज्य की आबादी और पानी की जरूरतें बहुत कम थीं। आज बेंगलुरु जैसे विशाल शहर और स्थानीय किसानों की जरूरतें कई गुना बढ़ चुकी हैं। कम बारिश के सालों में तय मात्रा में पानी छोड़ना व्यावहारिक रूप से मुश्किल है।

मेकेदातु परियोजना क्यों बनी विवाद की एक और वजह?

इन सबके बीच, कर्नाटक की प्रस्तावित 'मेकेदातु परियोजना' भी आग में घी का काम कर रही है। कर्नाटक का दावा है कि इस बांध से बेंगलुरु को पेयजल मिलेगा और बिजली बनेगी। वहीं, तमिलनाडु को डर है कि इस बांध के बनने से उसके हिस्से का पानी और ज्यादा बाधित हो जाएगा।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बाद सबकी निगाहें दोनों राज्यों द्वारा सौंपी जाने वाली स्टेटस रिपोर्ट पर टिक गई हैं। कोर्ट यह देखेगा कि इस साल मानसूनी बारिश की क्या स्थिति है, जलाशयों में कितना पानी बचा है और जमीनी हकीकत क्या है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इस जटिल समस्या का क्या स्थायी समाधान निकालती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: कावेरी नदी का उद्गम स्थल कहां है?

Ans: कावेरी नदी का उद्गम कर्नाटक के कोडगु जिले के ब्रह्मगिरि पहाड़ियों (पश्चिमी घाट) से होता है।

Q2: कावेरी जल विवाद मुख्य रूप से किन दो राज्यों के बीच है?

Ans: यह मुख्य रूप से कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच है, हालांकि इसमें केरल और पुडुचेरी भी हितधारक हैं क्योंकि वे कावेरी बेसिन का हिस्सा हैं।

Q3: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के फैसले में किस राज्य को कितना पानी आवंटित किया था?

Ans: सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के अनुसार, तमिलनाडु को 404.25 टीएमसी, कर्नाटक को 284.75 टीएमसी, केरल को 30 टीएमसी और पुडुचेरी को 7 टीएमसी पानी मिलना तय हुआ था।

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रिपोर्टर: Gunja Pandey

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