पश्चिम एशिया (Middle East) में एक बार फिर बारूद की गंध तेज हो गई है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनातनी अब एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है। अमेरिकी नौसेना ने ईरान के खिलाफ अपनी समुद्री नाकेबंदी (Naval Blockade) को बेहद सख्त कर दिया है। इस कदम से न केवल खाड़ी देशों में सैन्य हलचल बढ़ गई है, बल्कि वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति पर भी इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है।
समुद्री रास्तों पर अमेरिकी शिकंजा: आखिर वजह क्या है?
पेंटागन के रणनीतिक फैसलों के बाद अमेरिकी नौसेना ने फारस की खाड़ी (Persian Gulf) और ओमान की खाड़ी में गश्त और हवाई निगरानी कई गुना बढ़ा दी है। अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान के उस व्यापारिक और रणनीतिक नेटवर्क को रोकना है, जिसके जरिए तेल और सैन्य उपकरणों की आवाजाही का दावा किया जा रहा था।
अमेरिकी युद्धपोतों की इस आक्रामक तैनाती के बाद, क्षेत्र से गुजरने वाले हर संदिग्ध कार्गो और ऑयल टैंकर की कड़ी निगरानी की जा रही है। इसका नतीजा यह हुआ है कि ईरानी जहाजों की मुक्त आवाजाही पर ब्रेक लग गया है।
blockquote>"अमेरिकी नौसेना का यह कड़ा रुख ईरान की आर्थिक जीवनरेखा माने जाने वाले तेल निर्यात को पूरी तरह से पंगु बनाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।"
कच्चे तेल के दामों में उछाल: दुनिया पर क्या होगा असर?
हॉरमुज की जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया का सबसे संवेदनशील तेल परिवहन मार्ग है। वैश्विक स्तर पर खपत होने वाले कुल कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। अमेरिका की सख्ती के बाद शिपिंग सेक्टर में हड़कंप मच गया है:
- क्रूड ऑयल की कीमतों पर दबाव: सप्लाई चेन बाधित होने की आशंका से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
- शिपिंग इंश्योरेंस में बढ़ोतरी: युद्ध के जोखिम को देखते हुए जहाजों के बीमा और मालभाड़े (Freight Charges) की दरें काफी महंगी हो गई हैं।
- वैश्विक महंगाई का खतरा: अगर यह नाकेबंदी लंबी खिंचती है तो एशिया और यूरोप के बाजारों में ईंधन की किल्लत हो सकती है।
ईरान की कड़ी चेतावनी और भारत का रुख
उधर, तेहरान ने अमेरिका के इस कदम को सीधे तौर पर 'समुद्री डकैती' और उकसावे की कार्रवाई करार दिया है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने स्पष्ट किया है कि यदि उनके व्यापारिक या तेल टैंकरों पर कोई हमला होता है, तो इसका माकूल जवाब दिया जाएगा।
भारतीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो मध्य पूर्व में अस्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल इसी क्षेत्र से आयात करता है। तेल के दामों में कोई भी बड़ा उछाल भारत में ईंधन की कीमतों और आम महंगाई को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ईरान इस नाकेबंदी का जवाब कैसे देता है।